Monday, October 13, 2008

जिन्दगी का रूप


जिन्दगी का अजीब सा रूप देखा
लोगो को मुस्कुराते हुए अपने गमो को छुपाते देखा
और यहाँ अपनों को जख्म लगाते देखा
रौशनी में भी जुल्म को सिर उठाते देखा
धर्म के सौदागरों को धर्म भूलते हुए देखा

कहते हैं जिसे इंसानियत
उसे इन्सान का दामन छोड़ते हुए देखा
और कहते हैं जिसे ऊपर वाला
आज उसे भी अपनी बनाये इन्सान पर.....
शरमाते हुए देखा.....
निका*

Making a million friends is not a miracle, the miracle is to find a friend who will stand by U when a million are against U !!!

मैं जिन्दा हूँ

तू जिन्दा हैं तो जिन्दगी की
जीत पर यकीं कर
अगर कहीं हैं स्वर्ग तो
उतर ला जमीन पर
ये गम के और चार दिन
ये दिन भी गुजर जायेंगे
जब गुजर गए जिन्दगी के हजार दिन



If you ask me,4 how long i will b ur friend? My answer will b "I don't know".coz I really don't know which is longer,"Forever or Always".Nw hapy thur26708 (14.21)

Tuesday, October 7, 2008

मेरा जिन्दगी का सफ़र

मैं दो कदम चलती और एक पल को रुकती मगर,इस एक पल में जिन्दगी मुझसे चार कदम आगे चली जाती,मैं फिर दो कदम चलती और एक पल को रुकती मगर,जिन्दगी मुझसे फिर चार कदम आगे चली जाती,जिन्दगी को जीतता देख मैं मुस्कुराती और जिन्दगी मेरी मुस्कुराहट पर हैंरान होती,ये सिलसिला यूहीं चलता रहा,फिर एक दिन मुझको हंसती देख एक सितारे ने पुछा "तुम हारकर भी मुस्कुराते हो,क्या तुम्हे दुःख नहीं होता हार का?"तब मैंने कहा,मुझे पता है एक ऐसी सरहद आएगी जहाँ से जिन्दगी चार तो क्या एक कदम भी आगे नहीं जा पायेगी और तब जिन्दगी मेरा इंतज़ार करेगी और मैं तब भी अपनी रफ्तार से यूहीं चलती रुकती वहां पहुंचूंगी .........एक पल रुक कर जिन्दगी की तरफ देख कर मुस्कुरूंगी,बीते सफ़र को एक नज़र देख फिर चलूंगी,ठीक उसी पल मैं जिन्दगी से जीत जाउंगी,मैं अपनी हार पर मुस्कुरायी थी और अपनी जीत पर भी मुस्कुरुंगी और जिन्दगी अपनी जीत पर भी न मुस्कुरा पाई थी और अपनी हार पर भी न मुस्कुरा पायेगी,बस तभी मैं जिन्दगी को जीना सीख जाउंगी ....... निका*



Making a million friends is not a miracle, the miracle is to find a friend who will stand by U when a million are against U !!!

Friday, October 3, 2008

प्रश्न

अनेक प्रश्न ऐसे है जो कभी दोहराए नही जाते
बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो कभी बतलाए नही जाते

इसी कारण अभावो का सदा स्वागत किया मैंने
कि घर आ मेहमान कभी लौटाए नही जाते

हुआ क्या आँख से आँसू अगर बाहर नही निकले
बहुत से गी भी ऐसे है जो कभी गाए नही जाते

बनाना चाहती हूँ स्वर्ग तक सोपान सपनों का
मगर चादर से ज्यादा पाँव फैलाए नही जाते..........

Making a million friends is not a miracle, the miracle is to find a friend who will stand by U when a million are against U !!!

Saturday, September 20, 2008

जय पराजय

समुंद्र तट पर
क्या तुमने देखा हैं
लहरों का चट्टानों से टकराना?
कभी सोचा हैं.....
किसमे हैं शक्ति ज्यादा,
लहरों में टकराने की...
या
चट्टानों में चोट खाने की?
हर लहर लेकर आती हैं उत्साह
और भेदना चाती हैं उस पत्थर को
जो बना रहता हैं ज्यों का त्यों
जेसे अपनी नियति को दे दी हो
एक मौन स्वीकृति
मेरे अन्दर भी
एक एसा ही द्धुंद
हर क्षण
आशा की लहरों का
निराशा के पत्थरों से
एक अनवरत संघर्ष
नियति को बदलना चाहती हूँ
में पत्थरों की पराजय चाहती हूँ* ........
निका*

Making a million friends is not a miracle, the miracle is to find a friend who will stand by U when a million are against U !!!

Thursday, August 28, 2008

मेरी ख्वाहिश


मुझे वहाँ जाना हैं,
जहाँ मेरा साया भी
मेरे साथ न हो,
मुझे वहाँ जाना हैं,
जहाँ अतीत का कोई
नमो-निशान न हो,
मुझे वहाँ जाना हैं,
जहाँ चाहत, नफ़रत, बेरुखी
और प्यार भी न हो,
सभी को देखा,
कभी न कभी तो,
आपको भी महसूस हुआ होगा,
की वह वहाँ पर हो,
जहाँ कोई न हो ............

Making a million friends is not a miracle, the miracle is to find a friend who will stand by U when a million are against U !!!

Thursday, August 7, 2008

अब जिंदगी सुलझ चुकी है


हाँ,अब मेरे पास कोई सवाल नहीं है।
मेरे सारे सवालो के जवाब,
मुझे मिल चुके है।
अब जिंदगी सुलझ चुकी है,
सरल हो चुकी है।
मै अपनी तलाश बंद कर चुका हूँ।
जीवन के प्रति प्रश्नो की धार..
बहूत ऊँचाई से गिरकर,
समाधान का जलप्रपात बन चुकी है।
वरना लंबी हो चली थी प्रश्नावली,
जैसे धडकनो/साँसो की यात्रा,
या फिर शब्दो के आभाव से,
खिंचती चली जा रही कविता की तरह,
किंतु अब पूर्ण विराम है,
केवल पूर्ण विराम।
मिट चुके है, प्रश्नचिन्ह,
धूमिल,बिलकुल खत्म से,
कि जिदंगी क्या है?
समाधान/जवाब/जिदंगी..
है,मेरी कविता की डायरी।
मुझे याद हैकि मैने,
उस दिन से जीना शुरु किया था,
जब अकेलेपन से भडभडाकर,
पहली कविता को लिखा था।
अकेलापन दूसरी,तीसरी..
और पाँचवी कविता के साथ खत्म हुआ।
खामोशी को ,
आलोचनाओ/प्रंशसाओ ने घेर लिया।
फिर मै स्वयं से ही कहने लगा अपने अहसास,
छटवी मे कष्ट, तो आठवीं में खुशी का इजहार।
नौवी कविता से वो मेरे जीवन में आई,
दसवी तक मेरे सम्पूर्ण मे समाई,लेकिन
ग्यारहवी से लगा जैसे कि लौट जाऊ?
पर जिंदगी से कोई कैसे लौटे?
वो मेरी थी,
लगता था वो मेरी थी।
तेरह,पन्द्रह से लेकर अतिंम पृष्ठ तक।
चलता रहा ये सब बीस तक,
जोडता रहा मै सपने उन्तीस तक।
लगता है,अब ये गर्माहट खत्म हो जायेगी,
अहसासो पर बर्फ जम जायेगी।
तीस में,वो मुझे छोडकर चली जायेगी।
उसके बाद...
ढेर से खाली पृष्ठ...
अब मै फिर से उलझ चुका हूँ,
सवालो को पुनः फैला चुका हूँ,
समाधान उड चुके है,
मै उन्हे उडते हुए देख रहा हूँ,
sourc:yaksh parshan

Making a million friends is not a miracle, the miracle is to find a friend who will stand by U when a million are against U !!!